बचपन की यादें

I was reading an article by Gulzar in a sunday supplement last week. Therein, he mentioned of what drives him to write poetry. I was so influenced that I promptly took to penning words that came to me afterward. Lately, I’ve been reading a lot of hindi poetry and magazines, thus, my first two poems took shape inspired by Gulzar’s encouraging words. I’m posting a poem that’s essentially about my father and our memories from my childhood and later years. This is my first attempt at hindi poetry.


“बचपन की यादें”

किताबों में खो जाना

पाया विरासत में उनसे मैंने।

खो कर भी सचेत रहना

जाना उन्हें देखकर मैंने।

बचपन में शेर की आवाज

निकालकर खूब हँसाते मुझे,

फिर हवाई जहाज की

कहानियों में ले जाते मुझे।

स्कूटर पर जाते हम दूर

शहर के बाहर,

फिर सड़क के किनारे रूककर

दिलवाते गुलमोहर के फूल मुझे।

गन्ने का रस पीतें

हर गर्मियों के इतवार हम।

फिर शाम की सैर के बाद

खाते गरमा-गरम जलेबियाँ हम।

उनके साथ रोज सुबह

रेल्वे स्टेशन तक की राह,

कट जाती इतनी जल्दी

मानो वक्त की सुई तेज भागती।

धीर- गंभीर आवाज में उनकी

जब सुनती कोई कविता मै,

मन के पटल पर हमेशा के लिए

हो जाती रेखांकित मेरे।

कभी उनका मनपसंद गाना

टि.व्ही. पर सुनते,

तो ऊँचे स्वरों में हम दोनों

हमेशा गाने का लुफ्त उठाते।

ऐसी कितनी यादें है

जो मन के छोटे-छोटे कमरों में है बसी।

कभी आँखें मूँद लूँ सुकून से,

तो झट मेरे सामने हो खड़ी उठती।

– शरयू सुभाष गांगुर्डे


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